Thursday, September 15, 2011

तुम्हारा भी कोई मरा होता...

तुम्हारा भी कोई मरा होता,

तो तुम यूँ घरयाली आँसूं न बहाते.

खून से सनी हुई चीथड़ों पे,

अगली चुनाव का वोट न जुटाते.

पैर के छालों में दर्द कितना होता है.

ये जान ने तुम ऐ.सी. कार से न आते.

खौफ का मंज़र जानना होता तो,

१०० जवानों से घिर के न आते.

मौत का मातम ही मानना होता तो,

संसद में सिर्फ हंगामा ही नहीं करते.

पर मैं अब ये चाहता हूँ कि,

भले ही ये दुआ हो या बददुआ:

तुम्हारा भी कोई मरे,

वो भी खौफ से डरे,

नंगी लाशों से घिरे,

और आँखों में खून भरके कहे:

हमारी जान के लिए तुम,

"इन राक्षसों से क्यूँ नहीं लड़े?"

कुत्ते और लडकियाँ

कुत्तों और लड़कियों का सम्बन्ध आदि काल से चलता आया है, जब महाभारत के बाद पांडव हिमालय की चढ़ाई कर रहे थे तब वो यमराज रुपी कुत्ता द्रौपदी के स्नेहभाव से ही मंत्रमुग्ध होकर पीछे पीछे आया था. यह स्नेह आज वर्तमान युग में और भी ज्यादा प्रगाढ़ और अगोपनीय हो गया है. मैं जिस कैम्पस कीबात कर रहा हूँ वहाँ कुत्तों के अधिकार की बात ,लड़कों के अधिकार से पहले की जाती है. अगर कभी कोई गाड़ी कुत्ते को पकड़ने आ जाती है ,तो लड़कियों का अटूट प्रेम यूँ उमरता है जैसे माखन चोर कृष्ण को बाँधने के बाद ,यशोदा का उमरता था. जिस लड़की ने आज तक पेटा,ह्युमन राइट्स कमीशन आदि का नाम भी न सुना हो ,वो भी उनके दफ्तर पहुँच कर कुत्तों के लिए हंगामा मचाती नजर आती हैं. आज ये कुत्ता शब्द लड़कियों में इतना रच बस गया है कि इसकी व्यापकता और सम्पूर्णता इस बात से आँकी जा सकती है कि अक्सर बॉय फ्रैंड को लडकियाँ प्यार से कहते हुए सुनी जाती हैं: अबे कुत्ते, तू था कहाँ, फ़ोन क्यूँ नहीं उढाता,इत्यादि? अगर कोई कुत्ता किसी लड़के को काट ले तो वो कहावत चरित्रार्थ हो जाती है:"साँप ने आदमी को काटा, आदमी की तरफ कोई नहीं. या तो सब लाठी की तरफ हैं ,या साँप की तरफ." जेएनयू में फटे नंगे बच्चे भी घूमते हैं पर जिस लड़की के पास कुत्तों के लिए बिस्कुट होता है ,उन बच्चों के लिए उनके पास लम्बा चौड़ा भाषण होता है. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब में सेक्स रेसिओ अनुपातन काफी कम है यानि लडकियाँ माइनोरिटी में हैं,और कुत्ते जेएनयू में माइनोरिटी में हैं ,सो" एक की नाव में सवार यात्री दुसरे का दुःख भली भाँति जानेगा ही". हमारे कैम्पस में माइनोरिटी अधिकार की बाती जलाये रखने वाले "आइसा" ने भी कुत्तों की जमकर सुरक्षा करने का प्रण ले लिया है और आइसा का कहना है :"जाके पैर न फटे बिबाई, सो क्या जाने पीर पड़ाई"? इस" कुत्ते-लड़की-आइसा " के जंजाल में औरों का जीवन जंजाल बन गया है. मेरा साधारण सा प्रश्न है: कुत्ते और बिल्लियाँ जेएनयू की शोभा में चार चाँद कैसे लगाते हैं?,ये दोनों प्रजाति इस विश्वविद्यालय के रिसर्च में कितना सहयोग करते हैं?, ये गंदगी फैलाने वाले और(काटने वाले भी) यहाँ के बौधिक विकास में कितना योगदान देते हैं?,इन दोनों प्रजाति को मिलने वाला स्नेह" किसी और प्रजाति" को मिले तो बुरा क्या है?