Thursday, September 15, 2011

तुम्हारा भी कोई मरा होता...

तुम्हारा भी कोई मरा होता,

तो तुम यूँ घरयाली आँसूं न बहाते.

खून से सनी हुई चीथड़ों पे,

अगली चुनाव का वोट न जुटाते.

पैर के छालों में दर्द कितना होता है.

ये जान ने तुम ऐ.सी. कार से न आते.

खौफ का मंज़र जानना होता तो,

१०० जवानों से घिर के न आते.

मौत का मातम ही मानना होता तो,

संसद में सिर्फ हंगामा ही नहीं करते.

पर मैं अब ये चाहता हूँ कि,

भले ही ये दुआ हो या बददुआ:

तुम्हारा भी कोई मरे,

वो भी खौफ से डरे,

नंगी लाशों से घिरे,

और आँखों में खून भरके कहे:

हमारी जान के लिए तुम,

"इन राक्षसों से क्यूँ नहीं लड़े?"

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