Tuesday, November 3, 2009
भारतीय संस्कृति, साहित्य और साधना
भारतीय संस्कृति, साहित्य और साधना इन तीनो की संतों की देन अपरिमेय एवं विस्मयकारी है .संत साहित्य का मुख्य रस है मानव जीवन की आध्यात्मिक समरसता .जहाँ पहुंचकर सभी वाद द्वैत्त -अद्वैत्त अर्थहीन प्रतीत होने लगते है .चूँकि वह सीधे हृदय से निकलकर हृदय -हृदय को खीचती हुई अनंत पथ में चली जाती हैं .संत साहित्य की परम्परा सिर्फ़ साहित्य हलचल ही नही है वरन यह इस ओर भी इंगित करती है कि हमारे देश में चलने वाली सामाजिक -सांस्कृतिक उथल -पुथल से साहित्य का गहरा संबध रहा है .यह परम्परा इस बात को रेखांकित करती है कि भारतीय समाज न तो सर्वथा गतिहीन रहा है ओर न ही आम जनता हर समय ब्रहाम्न्वादी चिन्तनों के फरेब में फंसकर उसकी शोशंकारी समाज व्यवस्था को स्वीकार करती है .खासकर निर्गुण -भक्ति आन्दोलन के दौरान भारतवर्ष की निम्न कही जाने वाली जातियों ने वर्णाश्रम व्रहम्न्वाद एवं वाहायाचारों पर कड़ा प्रहार किया गया एवं इसके विपक्ष में जनमत भी बनाया .मूलतः यह भारतीय इतिहास में किसी खास वर्ग के सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ आम जनता के द्वारा प्रति संस्कृति के निर्माण का पहला प्रभावशाली प्रयास था .कई अर्थों में तो संत काव्य एक प्रभावसाली तूफान कि तरह आया जिसने समाज में व्यापत सरांध एक झटके से तितर वितर कर दिया .संस्कृत कूप जल को छोड़कर आम जन की भाषा में कविताओं की रचना की गई .वर्णवाद को देखते हुए कहा गया की एक ज्योति से सब उत्पन्न कौन ब्राहम्ण कौन सुदा .अर्थात संत काव्य वह जमीं है जहाँ वर्ग ,वर्ण,धर्म , नश्ल,सम्प्रदाय ,लिंग और जाति से संबंधित सारे भेद अस्त हो जाते हैं .इस कल में धर्म आगमन के सामने वाह्य
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