कबीर ने आपने काव्य में जो कोशिश की है वह सारी कोशिस समाज के विरूद्व खड़े होने की कोशिस है। कई बार लोग इसे पागल तक करार देते है। कबीर को इन्ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ा होगा तभी तो उन्होंने कहा है " सगरी दुनिया भई सायानी माय ही इक बौराना "। इक एसे समय में जब समूचा समाज कर्मफल और भाग्य बाद के मध्य में वर्ण व्यवव्स्था को स्वीकार कर चुका है और पाखंडी ब्राह्मण ही समाज के करता धरता हो तब कबीर द्वारा "अनभै सांचा " की महत्ता प्रतिपादित करना कितना दुष्कर रहा होगा। कबीर दस की येही पीर उन्हें बेचेन किए रहती है। उनकी पीड यह है की जिस संसार के लिए वे रत भर जागते और रोते है, सर धुनते है वोही संसार आराम से खा पीकर सोया हुआ है -" सुखिया सब संसार है खाए अरु सोवै, दुखिया दस कबीर है जगे ओरु रोबे"। वस्तुतः जागने वाले का रोना कभी ख़त्म नही होता है.
कबीर दस का ताल्लुक चूकी समाज के उस तबके से था जिसे शास्त्रों के अनुसार नीचे का स्थान दिया गया था। दूसरी बात यह की ये शास्त्र ही थे जो प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक असम्ताओं को बौधिक भूमि प्रदान करते थे। कबीर में आपने अनुभवों की बदौलत समझ लिया था किया की समाज के लिए श्रेयकर वे पोथिया नही है बल्कि वह प्रेम है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है " ढाई आखर" पढ़ने वाला ही असली ज्ञानी है। पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्ही चीजो के आलोक में कबीर पे करारा प्रहार करते हुए लिखा है - " कबीर था और किसी रहस्योनमुख निर्गुण भक्त की बनी में कोई इक भी एसी तत्त्व की बात बता सकता है जो शास्त्र की इक बहुत ही साधारण बात न हो? उक्ति वैलक्षण मात्र से कोई नया तत्त्व नही होता है "। यानि की शुक्ल जी स्पष्ट मत है की कबीर आदि संतो की प्रायः सभी बाते मुख्य रूप से शास्त्रों से ही उठाई गई है। बचा खुचा हुआ जो प्रभाव है, वह या तो सूफियों का है या फिर योगियों का। शुक्ल जी का यह मानना एक तरह से सारी चीजो को उलट कर रख देना है । दरअसल आचार्य शुक्ल को इन संतो से वास्तविक शिकायत यह की ये भक्त और संत है तो फिर भक्त ही तरह भगवत भक्ति में ही लीन क्यो नही रहते?
कबीर आदि ने तो पहले ही कह दिया था की हम शास्त्रों के कायल नही है। अतः वे इस कोटि के भक्त भी नही है जैसे भक्तो को आचार्य शुक्ल श्लाघ्य मानते है। शास्त्र और लोक के इसी मुठभेड़ से तो कबीर बेचेन थे - " मेरा तेरा मनवा कैसे एक होई रे, मै कहता आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी, मै कहता सुरझावनहारी , तू राख्यौ उरझाई रे। "
Tuesday, November 3, 2009
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