Tuesday, November 3, 2009

संत साहित्य एवं संत परम्परा

संत साहित्य एवं संत परम्परा का मूल्यांकन दो रूपों में किया जाता सकता है .एक सामाजिक दृष्टि से .निश्चय ही सामाजिक दृष्टि से इस कल का महत्व असंदिग्ध है .संतों ने विभिन्न उपासना पद्धतियों और जाति धर्म के बीच से रास्ता निकाला जो मानवता वादी दृष्टिकोण लिए हुए था .साहित्यिक दृष्टि से भी संत काव्य का महत्व कम नही है .अगर कुछ कवियों की चमत्कार्मूलक उक्तियों को छोड़ दें तो संतों ने अपनी बात सीधी औरत सरल ढंग से कही है .उनका काव्य यदि आज आकर्षित करता है तो अपनीअंतर्वस्तु के बल पर न की कलात्मकता के बल पर .उनका काव्य यह सिद्ध करता की साहित्य में कला की अपेक्षा कथ्य का महत्व आधिक होता है .

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