Tuesday, November 3, 2009

कबीर पर विचार

कबीर पर विचार करते समय एक महत्वपूर्ण सवाल तो यही खड़ा हो उठता है क्या कबीर ने ऐसा कुछ लिखा जिसे कविता या काव्य भी कहा जा सके.इस शक का कारण है की आचार्य शुक्ल ने तो उनकी बानियों को कविता ही नही माना ,उन्हें सांप्रदायिक शिक्षा कहते हुए खारिज किया.आचार्य दिवेदी ने उन्हें भक्ति का वाई प्रोडक्ट कहा है .आगे कबीर ने स्वयं ललकार लगायी है 'मसि कागद छुयो नही'.ऐसे में एक साहित्य का विद्यार्थी किस रस्ते चलकर कवि का मूल्यांकन करे .जाने या अनजाने स्वयं जी इसका उत्तर देते हैं.उन्होंने साहित्य का इतिहास में लिखा है (सुन्दरदास के विषय में ) संतों की परम्परा में सुन्दरदास सर्वाधिक पढ़े लिखे विद्वान् थे.लेकिन इस विद्वता के बावजूद आज कितने लोगों को सुन्दरदास के पद्य याद हैं .कहने का तात्पर्य है की आलोचक कितना भी विद्वान् क्यों न हो साहित्य में अन्तिम फ़ैसला सिर्फ़ जनता ही करती है ,और आज जनता कबीर के साथ है .क्योंकि अन्य संतों में जैसे कबीर के स्वाभाव में फक्कारता ,वाणी में अख्ख्हरता तथा दादू में प्रेम एवं मूल्क्दास में चाकरी जैसा वैसिष्ठ है वही सुन्दरदास में ऐसा कुछ भी नही है उनके पढ़े लिखे होने के बावजूद .

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